यदि आप भी अपने देश पर निबंध लिखना चाहते हैं तो आज हम आपको बताएंगे कि किस प्रकार से एक अच्छे निबंध लिखा जा सकता है एक अच्छा निबंध लिखने के लिए क्या-क्या चीजें होनी आवश्यक है और और किस प्रकार से होनी चाहिए क्योंकि एक अच्छा निबंध तभी कहा जा सकता है जब उसमें क्रमबद्ध ता हो नी हो क्योंकि क्रमबद्धता एक अच्छा निबंध लिखने में सहायता करता है आइए अब हम जानते हैं कि किस प्रकार से अच्छा निबंध लिख सकते हैं। अच्छा निबंध लिखने के लिए मुक्ता चार पांच बातों का ध्यान रखना आवश्यक है जैसे प्रस्तावना,उसके प्रति स्वभाव, निष्कर्ष आदि। यदि आप अपने देश पर निबंध लिखना चाहते हैं या स्वदेश पर तो सर्वप्रथम हमें सो देश का अर्थ मालूम होना चाहिए स्वदेश होता क्या है? इसका क्या मतलब है?
स्वदेश का मतलब अपना देश जिसमें हम बचपन से खेलते कूदते आ रहे हैं जिस देश से हमें सबसे अधिक प्रेम है वह अपना देश होता है क्योंकि अपने देश से अधिक प्रेम होता है न कि दूसरे से।
स्वदेश पर निबंध
1.प्रस्तावना —
ईश्वर द्वारा बनाई गई सर्वाधिक अद्भुत रचना है ‘जननी’ जो निस्वार्थ प्रेम की प्रतीक है प्रेम का ही पर्याय स्नेह की मधुर बयार है सुरक्षा का टूट कवच है संस्कारों के पौधों को ममता के जल से सींचने वाली चतुर उद्यान रक्षिका है जिसका नाम प्रत्येक शिशु को नमन के लिए झुक जाने का प्रेरित कर देता है यही बात जन्म भूमि के विषय में भी सत्य है इन दोनों का दुलार जिसने पा लिया उसे स्वर्ग का पूरा पूर्व अनुभव धारा पर ही हो गया इसलिए जननी और जन्मभमि की महिमा को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया गया है।
2.देश प्रेम की स्वाभाविकता—
संसार का हर एक नागरिक अपने देश से प्रेम करता है चाहे उसका देश बर्फ के टुकड़ों से ढका हो या नदियों से घिरा या फिर पहाड़ों से ही क्यों न गिरा वह अपने देश से प्रेम रखता रखता ही है क्योंकि वह अपने देश में पला बढ़ा है जिसकी अहमियत वह जानता है हर देश की अपनी मिट्टी की अपनी एक्सान होती इसे हम भारतवासियों की अपनी मिट्टी की शान अद्भुत है जिस जिसने भी इसे अपनाया उसने खोने का प्रयत्न नहीं की। इस बात की पुष्टि रामनरेश त्रिपाठी जी के निम्न पंक्तियां स्पष्ट करती हैं
विश्वत रेखा का वासी जो, जीता है नित हाफ हाफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृभूमि पर।।
ध्रुववासी जो हिम मे तम में, जी लेता है कांप कांप कर।
वह भी अपनी मातृभूमि पर, कर देता है प्राण निछावर।।
जब हम कुछ दिनों के लिए घर से दूर जाते हैं और पुनः जब कार्य होने के बाद वापस लौटते हैं तो जहां हम वापस आते हैं वही हमारा मातृभूमि या जन्मभूमि होता जिस प्रकार पक्षी अपने भोजन की तलाश में दूर देशों तक चले जाते परंतु शाम होते ही वह अपनी विशेष उमंग के साथ अपने घोंसले की ओर लौटने लगते हैं यही मातृभूमि का प्रतीक होता है कि जब भी हम कहीं जाते हैं तो हमें वापस लौटने की प्ररेणा बनी रहती है जो हमारी मातृभूमि से मिलती है जन्म भूमि की तुलना में स्वर्ग का सुख भी तुच्छ होता है
देश के प्रति कर्तव्य —
जिस देश में हमने जन्म लिया है जिसका अन्य खाकर और अमृत के समान हम जल पीकॉक सुखद वायु का सेवन कर हम बलवान हुए हैं जिसकी मिट्टी में खेल कूद कर हमने पुष्ट शरीर प्राप्त किया है उस देश के प्रति हमारे बहुत सारे कर्तव्य हमें अपने देश के लिए कर्तव्य पालन और त्याग की भावना से सेवा करनी चाहिए हमें अपने देश की 1 इंच भूमि के लिए तथा उसके सम्मान और गौरव के लिए प्राणों की बाजी भी लगा देनी चाहिए यह सब करने पर भी जन्मभमि या अपने देश के ऋण से हम कभी भी मुक्त नहीं हो सकते
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भारतीयों का देश प्रेम
भारत मां के नवरत्न को जन्म दिया जिन्होंने असीम त्याग भावना से प्रेरित होकर हंसते-हंसते मातृभूमि पर अपने प्राण अर्पित कर दी कितने ही ऋषि-मुनियों ने अपने तप और त्याग से इस देश की महिमा को मनोनीत किया है मनीष वीरों ने अपने शौर्य से शत्रु के दांत खट्टे की बन बन भटक ने वाले महाराणा प्रताप ने घास की रोटियां खा कर खाना स्वीकार किया परंतु मातृभूमि के शत्रुओं के सामने कभी मस्तक नहीं झुका है इसी प्रकार ऐसे अनेक वीर जवान जो हमारे देश की रक्षा करते रहे प्राचीन काल में शिवाजी जैसे वीर योद्धा पुणे इस देश की गौरव को बचाया है भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, अशफाक आदि कई वीरो ने इस देश को खुशियां देकर स्वयं फांसी के फंदे को चूम लिया।
उपसंहार
खेद का विषय यह है कि आज हमारे नागरिकों में देश प्रेम की भावना अत्यंत दुर्लभ होती जा रही है नई पीढ़ी का विदेशों में जाना और अपनी संस्कृति के प्रति अंधाधुन मुंह स्वदेश के बजाय विदेश में जाकर सेवाएं अर्पित करने के सर जी ने सपने वास्तु में चिंताजनक है हमारी पुस्तके भले ही राष्ट्रप्रेम की कथाएं पाठ्य समाधि में सजाएं रहे परंतु वास्तव में नागरिकों के एड देने गौरव सच्चा प्रेम ढूंढने पर भी उपलब्ध नहीं हो हमारे शिक्षाविद व बुद्धिजीवियों को इस प्रश्न का समाधान खोजना ही होगा अब मात्र उपदेश या अतीत के गुणगान से वह प्रेम उत्पन्न नहीं हो सकता हमें अपने राष्ट्र की दशा व सभी अनिवार्य रूप से सुधार नहीं होगी प्रत्येक देशवासी को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके देश भारत की देश की बगिया में राज्य के अनेक यारियां किसी भी एक नारी की उन्नति मात्र से ही उस देश की उन्नति हो जाती है जिस प्रकार एक माली अपने फोन की सभी कार्यों की देखभाल समान भाव से करता है उसी प्रकार हमें भी देश का सर्वांगीण विकास करना चाहिए स्वदेश प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक गुण निश्चित रूप से ग्रहण व्यापक रूप से ग्रहण करना चाहिए संस्कृत रूप में ग्रहण करने से विश्व शांति को खतरा हो सकता है देश प्रेम की भावना के साथ समग्र वार्ता को भी ध्यान में रखना चाहिए इस संबंध में 1 पंक्तियां निम्न है
जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जय हिन्द वन्देमातरम 🙏🙏🙏🙏🙏🙏
